मेरी बात बीच में रह गई

✦ मेरी बात बीच में रह गई ✦

 - ममता और विछोह पर एक मर्मस्पर्शी कविता 
 ✒️ लेखन: अनु चंद्रशेखर


सूर्यास्त की पृष्ठभूमि में माँ और बच्ची की silhouette, पास में दीपक, पुरानी तस्वीर और खुली डायरी — ममता और विछोह को दर्शाती भावपूर्ण छवि
कुछ बातें शब्दों तक नहीं पहुँच पातीं — वे बस दिल में रहती हैं, हमेशा के लिए। 


प्रस्तावना

यह कविता एक अधूरी पुकार है—एक ऐसे रिश्ते की, जहाँ शब्द कहे नहीं जा सके और भाव दिल में ही रह गए।
इसमें तड़प है, खोया हुआ अपनापन है, और उस ममता की तलाश जो कभी पूरी न हो सकी।
हर पंक्ति एक अनकही बात का भार लिए है, जो जीवन और मृत्यु की गहराइयों में खोकर भी दिल में गूँजती रहती है।


कविता

✦ मेरी बात बीच में रह गई ✦

तुम जल्दी में थीं, चली गईं,  

मेरी बात अधूरी रह गई।  


तुम व्यस्त थीं अपने बहन-भाइयों में,  

ढूँढ़ती ज़िंदगी को उनकी परछाइयों में।  


ना तुम मिली, ना तुम्हारा साथ,  

और ना तुम्हारी ममता।  

मेरे भीतर की खाई गहरी हो गई,  

और मैं खो गई तुम्हारी गुँथी हुई गहराइयों में।  


ना मैं कह सकी, ना तुम सुन पाईं,  

मेरे दिल की दिल में ही रह गई।  


मैं सोचती थी, तुम हो… और रहोगी, 

कभी मेरे बारे में भी सोचोगी,  

पर वक्त कहाँ था तुम्हारे पास,  

तुम मजबूर थीं, लाचार भी,  

और तुम जीवन-मृत्यु के गर्भ में खो गईं।  



मैं तरस गई तेरे प्यार को, तेरे सुनहरे दीदार को,  

तेरे बाद जो मेरा हिस्सा कभी न हो सका।  

बस एक उम्मीद थी जो दिल में जगी,  

और तड़पती वेदना बनकर दिल में रह गई।  



मेरी बात बीच में रह गई,  

तुम चली गईं…  

ना मैं कह सकी, ना मैं सह सकी,  

दिल की दिल में ही रह गई।  


आज भी तुम मेरे जीवन के किस्सों में सजी हो।  

स्मृतियों की माला में छोटी-सी कली के रूप में खिली हो।  

मेरे सपनों का आँचल ओढ़ चली हो,  

मेरे दिल की गहराइयों में रहती हो।  

समय के संग, कुछ और राज़ कहती हो,  

मेरी ज़िंदगी की तरह।  


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रचना का सार

हर शब्द एक मंत्र, हर रचना एक अनुष्ठान।

इस कविता की यात्रा इन पड़ावों से होकर गुजरती है:

अधूरापन → प्रतीक्षा → समझ → वियोग → वेदना → स्मृति → स्थिर स्वीकृति
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लेखकीय संवाद: दिल से दिल तक

कभी-कभी शब्द होंठों तक आते-आते रुक जाते हैं, और जिनसे हमें उन्हें कहना होता है, वे वक्त की धुंध में ओझल हो जाते हैं। यह कविता उस 'अधूरी बातचीत' का एक हिस्सा है, जिसे मैंने सालों से अपने भीतर सहेजकर रखा था। अक्सर हम अपनों को 'ग्रांटेड' (granted) ले लेते हैं, पर क्या हम सच में जानते हैं कि आखिरी मुलाकात कब हो जाए?

हम रिश्तों में अक्सर शिकायतें ढूँढते रह जाते हैं, पर समय बीतने पर समझ आता है कि सामने वाला भी अपनी मजबूरियों और जीवन-मृत्यु के चक्र में फंसा था। इसलिए, यह रचना केवल वियोग नहीं, बल्कि मेरे भीतर की एक गहरी 'माफी' और 'स्वीकृति' भी है।

मैं आपसे पूछना चाहती हूँ... क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा 'अधूरा वाक्य' है जिसे आप कभी पूरा नहीं कर सके? 

स्मृतियों की उस अनकही कली को आप अपने दिल में कैसे सहेजते हैं?

एक छोटा सा आह्वान: अगर इस कविता ने आपके दिल के किसी कोने को छुआ है, तो आज ही अपने किसी प्रियजन को कॉल करें और वो बात कह दें जो आप कहना चाहते हैं। इंतज़ार मत कीजिए, क्योंकि अक्सर 'बातें बीच में रह जाती हैं'

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साझा करें अपनी 'अधूरी बात'

यदि आपको उस व्यक्ति से एक आखिरी बात कहने का मौका मिले जो अब आपके पास नहीं है, तो वह एक शब्द या वाक्य क्या होगा?

नीचे कमेंट्स में अपना वह एक शब्द या संदेश साझा करें। मैं आपके द्वारा भेजी गई इन्हीं 'अधूरी बातों' और भावनाओं को अपनी अगली कविताओं का आधार बनाना चाहूँगी। आइए, इस मंच पर हम अपनी अधूरी अनुभूतियों को शब्दों के ज़रिए पूरा करने की कोशिश करें।

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✍️ लेखन एवं अभिलेखन टिप्पणी

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नोट: अनु चंद्रशेखर | CC BY-NC-ND 4.0 | सभी अधिकार सुरक्षित ,(विस्तृत जानकारी के लिए, देखें https://abhivyaktanubhuti.blogspot.com/p/license-usage-disclaimer.html )

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